समाजवादी जंग या सियासत का खेल

समाजवादी जंग

समाजवादी जंग

कुछ लोग अपने पैर पर कुल्हाढ़ी मारते है परन्तु समाजवादी पार्टी ने अपने पैर खुद ही कुल्हाढ़ी पर पटक दिया है| भला राजनीति इस तरह होता है? चुनाव के आस-पास लोग दूसरी पार्टियों में मतभेद पैदा कर उनको तोड़ने की कोशिस करते है परन्तु समाजवादी पार्टी में तो तीनो सरगना अपनी पार्टी को तोड़ने में लगे है|

कुछ का मानना है कि यह सब प्रायोजित है जिसके ज़रिये मुलायम सिंह अपने भाई शिवपाल को किनारे लगते हुए अपने बेटे अखिलेश कि दावेदारी मज़बूत कर रहे है| ताकी लड़ाई-झगड़े, बदनामी के बीच अखिलेश यादव बतौर दागरहित, मजबूत, युवा-हिम्मती विकास पुरुष के रूप में उभरे।

तो कुछ का मानना है की साधना गुप्ता अपने बेटे प्रतीक का भविष्य सुरक्षित करने के लिए पार्टी को तोड़ रही है| तो राजनीति को बारीकी से देखने वाले यह सब अमर सिंह का प्रतिशोध की कहानी बता रहे है|

परन्तु मुलायम सिंह परिवार के नजदीकी सोचते है की मुलायम सिंह भी धीरे-धीरे उसी तरफ बढ़ रहे है जिधर दिलीप कुमार, अटल बिहारी और जार्ज चले गए है| उनको शिवपाल एवं अमर सिंह गैंग ने घेर लिया है और उनसे मनमाने आज्ञा निकलवाते रहते है| इसके प्रमाण में लोग हाल के नेता जी वालो दो आज्ञा दिखाते है जिसपर उनके हस्ताक्षर एकदम अलग है|

कहानी दुबारा ना दुहराकर संक्षेप में निष्कर्ष यह है यादव परिवार टूट ही गया है| अखिलेश से एक साफ़-सुथरे लीडर की उपजी आशा पर पानी फिर चुका है| कहानी कितनी भी कर लें की यह सब समाजवादी पार्टी को मीडिया में चमकाने का प्रयास है, कोई कहानी भी सच नही केवल इसके की सत्ता और सत्ता के द्वारा “मोटे माल” पर सबकी निगाह है| और यदि चुनाव हार भी जाये तो भी, यदि क्या पक्का हारेंगे अगर मुस्लिम वोट सपा से हट गया तो, अखिलेश मज़बूत विपक्ष नेता बन कर 2019 के आम चुनाव में प्रधानमंत्री पद के कोशिस करे|

अंत में यह कहना उचित होगा की प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शामिल सारे नेताओ में अखिलेश सबसे ज्यादा साफ़ छवि के नेता होंगे| और अपने ही परिवार के प्रति ह्र्द्यहीनता दिखा कर वे परिवारवाद से भी ऊपर उठ चुके है|

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