राहुल गाँधी, उनके निकम्मे तथा स्वार्थी सलाहकार
यदि हम अखिलेश यादव को समाजवादी मुलायम सिंह परिवार से अलग साफ़-सुथरी छवि का नेता मानते है तब हम राहुल गाँधी को भी साफ़ सुथरी छवि का नेता मानने से क्यों इनकार करते है| क्योंकि जैसे अखिलेश पर कोई भी व्यक्तिगत आरोप नहीं है उसी तरह राहुल गाँधी पर भी कोई व्यक्तिगत आरोप नहीं है|
आरोपों से यादव परिवार भी घिरा है और गाँधी परिवार भी| अखिलेश यादव को भी अपने पिता, चाचा, भाई और मंत्रियो में भ्रष्टाचार नही दीखता है और राहुल गाँधी को भी गाँधी परिवार, अपने जीजा और मंत्रियो में भी कोई भ्रष्टाचार नही दीखता है| परन्तु उनपर किये गए किसी आरोप का बचाव ना तो अखिलेश करते है ना ही राहुल गाँधी| इसमें भी इनकी कोई गलती नहीं है की बड़े परिवार में पैदा होने से दोनों को बहुत ऊँचा मंच मिला तथा बिना ख़ास मेहनत के उनको बहुत ऊँचे मुकाम हासिल हुआ|
दोनों में फर्क केवल इतना है कि अखिलेश अधिकतर अपनी बुद्धि का प्रयोग करते है और उनके मुख्य सलाहकार रामगोपाल यादव् ना केवल एक मझे, शांत और राजनीति के प्रोफेसर है तथा वे बहुत महत्वाकांक्षी व्यक्ति नही है|
जबकि राहुल गाँधी के सलाहकार या तो नौसिखिये नेता है या स्वार्थी बुड्ढ़े है जो इतने वर्ष में भी अपने स्थान नहीं पाए है| उनकी महत्वाकांक्षा उनको राहुल गाँधी को सही सलाह देने से रोकती है| इसलिए राहुल गाँधी ने प्रशांत किशोर जैसों की सलाह मानते हुए केजरीवाल स्टाइल में नरेंद्र मोदी पर हल्ला बोल तरीका अजमा रहे है, जिसमे वे लगातार फेल भी हो रहे है| इतने खुले मुद्दों को होने के बाद भी जिस-किसी में सडे-गले “डायरी के पेपर” को लेकर राहुल गाँधी को मोदी पर हल्ला बोलने को कहा था, उसने राहुल गाँधी और कांग्रेस का अकथनीय नुक्सान किया है| यदि सलाहकारो का यही हाल रहा तो आगामी यूपी, पंजाब, गोवा, उत्तराखंड चारों राज्यों के चुनावों में कांग्रेस डुबेगी|
राहुल गांधी प्रभावी वक्ता नहीं है परन्तु उनके सूट-बूट और भूकम्प जैसे वाहियात और कमजोर कथन की चमचा टाइप नेताओ ने इतनी तारीफ़ किया कि वे अपने को बेहतरीन वक्ता समझने लगे| ऊपर से सोने में सुहागा, चुनाव को ले कर ऐसे पार्टी नेताओं के प्रभाव में है जो कांग्रेस को ही डुबाने का काम कर रहे हैं।
कहा जा रहा है कि गोवा में संघ ईसाई समुदाय का विश्वास जीतने में असफल रही है परन्तु दिग्विजय सिंह उसको ना भुना कर ठाकुर नेता राणे के बेटे के सलाह पर ऐसा रवैया अपनाए हुए हैं कि ईसाई आबादी भड़की बैठी है। यदि यही रवैया बना रहा तो कोई आश्चर्य नही की गोवा में मनोहर पर्रिकल सरकार विरोधी एंटी इनकंबेसी के बावजूद भाजपा जी भी जाए।
पंजाब, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस का भगवान मालिक है। गुलाम नबी आजाद, कैप्टन अमरिंदर सिंह और हरीश रावत तीनों अपने झंडे लिए अपना राग गा रहे है। यदि कोई कांग्रेस का सही माने में हित-चिन्तक होता तो उत्तर प्रदेश में हुए समाजवादी बिखराव का फायदा उठा बसपा के साथ गठबंधन करता और मुस्लिम वोट को बिखरने से बचा कर सत्ता में भागेदारी करता| बहन जी भी कांग्रेस की पुरानी सहयोगी रही है, बस अह्म के कारण वे आगे बढ़ कर कांग्रेस से गठबंधन नही करना चाहती| राहुल गाँधी को यदि राजनैतिक बुद्धि होती वे तुरंत मायावती से स्वयं सम्पर्क कर गठबंधन की सम्भावना तलाशते| इसी तरह उत्तराखंड में रावत को गढ़वाल क्षेत्र की राजनीति का फायदा उठाना चाहिए| उधर अरमिंदर की सारी राजनीति सिद्धू को लेने या ना लेने पर टिकी हुयी है|
इस सब राजनीति की उलझनों को समझकर उसकी गाँठ निकालने की जगह राहुल गाँधी छुट्टी मानाने विदेश की सफ़र कर रहे है| जबकि उनकी सलाहकारों को राहुल गाँधी के नाराजगी का परवाह किये बिना उनको देश में रूककर अपने सेनापतियो के बीच बैठ आगे आने वाले चुनावी रण को जीतने का गंभीरता से प्रयास करना चाहिए|
यदि मैं राहुल गांधी का सलाहकार होता तो उनकी नाराज़गी की बिना परवाह किये उनके देश लौटने पर मजबूर कर राजनैतिक शेषनागो से खेलने की सलाह देता| परन्तु यदि मैं सलाहकार होता तब ना| और यही राहुल गाँधी का दुर्भाग्य है की उनको सही सलाह देने वालो कोई भी नहीं है|




