बिना बिचारे जो कर वो पाछे पछताय
ममता बनर्जी कि राजनैतिक पारी आन्दोलन से शुरू हुयी थी और वे सिंगूर और नंदीग्राम में ज़मीन अधिकरण के खिलाफ आंदोलन की अगुआई से सत्ता में आई थीं| और अब ज़मीन अधिकरण के खिलाफ आन्दोलन ही उनके गले की फांस बना हुआ है| वो कहते है की ममता जी! बिना बिचारे जो कर वो पाछे पछताय|
हुआ ये की सत्ता में आते ही ममता दी में ज़मीन अधिकरण ना करने की कसम खाई थी| परन्तु ऐसा होता तो नहीं| ज़रूरी और जनहित कार्य के लिए ज़मीन का अधिकरण करना ही पड़ता है| सो दक्षिण चौबीस परगना जिले में बन रहे बिजलीघर के लिए जमीन का अधिग्रहण हुआ था| अब बिजली घर तकरीबन बन गया है| बस हाईटेंशन तारों के लिए खंभे गाड़ने बाकी हैं। उसके लिए भी तो जमीन चाहिए। इलाके के लोग इसी अतिरिक्त अधिग्रहण के खिलाफ उठ खड़े हुए हैं। यही भांगड़ इलाके में 2013 में सोलह एकड़ जमीन का अधिग्रहण विवाद का मुद्दा बन गया है।
इस बात को लेकर किसान इस ज़मीन अधिकरण का विरोध कर रहे है| ऊपर से इस आंदोलन में माओवादियों के कूद पड़ने की भी खबर है| विपक्ष से मुद्दे को कस कर भुना रहा है| आन्दोलनकारियों पर पुलिस फायरिंग में दो व्यक्ति की मौत भी हो गयी| इस फायरिंग और आन्दोलन की उग्रता को देखते हुए, ममता ने फिलहाल परियोजना का काम रोक दिया है। ऊपर से उनको यह यह भरोसा भी देना पड़ा की ज़रूरत पड़ने पर बिजली घर किसी और स्थान पर शिफ्ट कर दिया जाएगा| पर इस बात की क्या गारंटी है की दूसरी जगह ज़मीन अधिकरण के खिलाफ आन्दोलन नहीं होगा|
पुलिस रिपोर्ट के आधार पर सरकार ने इस हिंसा ठीकरा माओवादियों और बाहरी तत्वों के सिर फोड़ दिया है। पर विपक्ष इससे संतुष्ट क्यों होता? सच तो यह है की ममता दी ने जो कुछ सिंगूर और नंदीग्राम में जो बोया था उसी को काट रही हैं| लोगों की नाराजगी से बेचैन ममता ने अब नुकसान की भरपाई की बात करनी शुरू कर दिया है|
भांगड़ इलाके के आन्दोलन और ममता का बारबार बदलती सोच ने एक बार फिर बिवेशको को बंगाल से दूर कर दिया है जबकी मुख्यमंत्री का सबसे बड़ा एजेंडा प्रान्त के लिए निवेश खोजना और निवेशको के विश्वास को जीतने का है|
किसी ने सही ही कहा है कि बिना बिचारे जो कर वो पाछे पछताय|




