क्या सर्वोच्च न्यायालय के फैसले भी फेसबुक के पोस्ट की तरह है?
सर्वोच्च न्यायालय
माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने लगभग पच्चीस साल पुरानी दो चुनाव याचिकाओं के निराकरण के अपने बहुमत (4:3) के फैसले ने धर्म, संप्रदाय, जाति व भाषा के आधार पर वोट अपील को भ्रष्ट आचरण ठहराया है और जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 123 (3) को प्रत्याशी के साथ अन्य पर भी लागू मानते हुए कहा कि चुनाव एक धर्मनिरपेक्ष प्रक्रिया है। आशा तो यही करनी चाहिए की इस फैसले से धर्म, संप्रदाय या जाति के ठेकेदारों के फतवों व अपीलों पर अंकुश लगाने में मदद मिलेगी।
परन्तु असलियत में क्या हुआ? इस फैसले के दूसरे ही दिन मायावती ने 87 दलित, 97 मुस्लिम, 66 ब्राह्मण, 36 क्षत्रीय, 11 कायस्थ, वैश्य व पंजाबी तथा 106 अन्य पिछड़ा वर्ग के लोगो को अपनी पार्टी का टिकट देने की घोषणा कर दिया|
उसी शाम एक टीवी चैनल ने लोकनीति व सीएसडीएस की सर्वे रिपोर्ट का हवाला देते हुए धार्मिक व जातीय आधार पर समाजवादी पार्टी को यादवों, बहुजन समाज पार्टी को जाटवों, भारतीय जनता पार्टी को सवर्णों के वोट अधिक प्रतिशत में मिलने आदि की संभावना व्यक्त कर दिया।
अब प्रश्न यह है की क्या इस प्रकार उम्मीदवारों की घोषणा और सर्वे रिपोर्ट सार्वजनिक करना संविधान और सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की भावना के अनुकूल है? या इनको भ्रष्ट आचरण का दोषी मान कर माननीय सर्वोच्च न्यायालय स्वयं संज्ञान लेगी जैसा की वह अन्य छोटे-मोटे मामले में लेती रहती है?
यह तो समय ही बताएगा कि क्या कोर्ट के फैसले भी फेसबुक के पोस्ट की तरह है, जिनका कोई मोल नहीं और ये बौद्धिक अभ्यास मात्र है या सर्वोच्च न्यायालय अपने फैसले पर नेताओं को अमल करने के लिए मजबूर भी करेगा?




