निक्कू की दुविधा

निक्कू उर्फ़ नितीश कुमार का स्वभाव उनको दुविधा में फंसता रहता है| अबकी बार इधर मोदी जी ने नोट बंदी किया उधर निक्कू फिर दुविधा में फंस गए हैं। नीकु ने कालेधन के खिलाफ मोदी की इस पहल की मुक्त कंठ से सराहना की थी। पहले तो उनके वर्तमान साथी लालू चुप रहकर उनके साथ रहे शीघ्र ही उनको नोट बंदी से व्याकुल जनता की तकलीफ का आभास होने लगे जिसकी आग में वे अपनी राजनैतिक रोटी सकने की तैय्यारी करने लगे| और लालू ने एलान कर दिया है कि मोदी के खिलाफ नोटबंदी के मुद्दे पर 28 दिसंबर को होने वाले धरने में नीकु भी शामिल होंगे।

भाजपा के विरोध का कोई मौका ना चूकने वाले लालू ने इशारो इशारो में जाता दिया कि चाहे नीकु भाजपा के साथ रहे परन्तु लालू अपना मोदी विरोधी कार्यक्रम चालु रक्खेगे| हालाँकि नितीश भी कम मोदी विरोधी नहीं है| क्योंकि जब मोदी को प्रधानमंत्री बनाने का सवाल आया था तो उन्होंने भाजपा से गठबंधन तोड़ने में पल भर की देर नहीं लगाई। परन्तु वे नोट बंदी में मोदी का साथ देते दिख रहे है|

अत: उनकी दुविधा लालू के साथ धरने में शामिल होने को लेकर बताई जा रही है। लोग सवाल तो करेंगे ही कि पहले तो नोटबंदी का समर्थन कर रहे थे फिर अब क्या लालू के दबाव में झुक गए। यू-टर्न लेने जैसी होगी उनकी हिस्सेदारी। पर हिस्सा नहीं लिया तो लालू की अहमियत घटेगी। जिनकी बदौलत वे राज कर रहे हैं। नितीश के विधायक संख्या में लालू के विधायकों से कम ही हैं। इसलिए वे कहने लगे हैं कि पचास दिन बीतने के बाद इस मुद्दे की समीक्षा करेंगे। समर्थन जारी रखने या विरोध करने का फैसला उसी के आधार पर होगा। क्या कोई बीच का रास्ता निकलेगा? या तो केवल समय बता सकता है| फिलहाल नितीश बड़ी दुविधा में फंसे नज़र आते है|


(उपरोक्त कार्टून श्री कुरीन की बौद्धिक सम्पति है जिसका उपयोग इस पोस्ट की वैल्यू बढ़ने के लिए किया जा रहा है|)

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