जो दल बदले आपना, चले हमारे संग

दल Party with difference…औरो से भिन्न….यही नारा देती है राष्ट्रीय दल बीजेपी| सत्ता के लिए नही अपितु कभी केवल देश के लिए ही जीने-मरने वाली पार्टी भारतीय जनता पार्टी यानी बीजेपी का अब केवल एक लक्षय नज़र आता है और वह है सत्ता|

तभी तो दल बदलुओ को ज्यादा महत्त्व दे रही है पार्टी| आसाम से लगा दल बदलुओ का चस्का बीजेपी को उत्तराखंड में भी दल बदलुओ से सरकार बनवाने के लिए प्रेरित कर रहा है| ना..ना..ना..यह कहने से तो काम नहीं चलेगा की बाक़ी दल भी आयाराम-गयाराम का सहारा लेकर सत्ता हासिल करने की कोशिस करते है| जी हां करते है परन्तु वे अपने को Party with difference…औरो से भिन्न होने का दावा तो नहीं करते|

अब आइये उत्तराखंड में| उत्तराखंड में तो बीजेपी ने सारी सीमाएं ही तोड़ दी। सबको पता है की किस तरह बीजेपी ने हरीश रावत सरकार को गिराने के लिए खेल खेला तथा कैसे उसने अदालत से फटकार खाई| मगर हुआ ये कि जिन कांग्रेस के विधायकों को तोड़ा था वही बीजेपी की मजबूरी बन गए है| दुसरो को अपनाते अपनाते अपने  सोचा भी नहीं अपने रूठ जायेंगे|

इस चुनाव में उम्मीदवारों के नामों के एलान की सुगबुगाहट के साथ ही बगावती तेवर सामने आने लगे| बाहरी बनाम प्रतिबद्ध की जंग सड़कों शुरू हो गई। उसका कारण साफ़ है कि अमित शाह को भगत सिंह कोश्यारी, भुवनचंद खंड़ूड़ी और रमेश पोखरियाल निशंक जैसे तीन पूर्व मुख्यमंत्री होते हुए भी कांग्रेस से आए सतपाल महाराज, विजय बहुगुणा और हरक सिंह रावत ज्यादा प्यारे हो गए हैं| सोने पर सुहागा श्री आयाराम अर्थात अचानक ही घुस आये कांग्रेस के दलित नेता यशपाल आर्य को एक के बजाए दो टिकट थमा दिए। मतलब एक उनके बेटे के लिए बतौर बोनस। ब्राह्मण चहरे के नाम पर नारायण दत्त तिवारी के अदालती पुत्र रोहित शेखर को टिकट थमा दिया|

मतलब साफ़ है कि कुछ भी करना पड़े, सत्ता मिलनी चाहिए। इस चक्कर तीरथ सिंह रावत का चौबट्टा खाल से टिकट उड़ गया। ओम गोपाल रावत, शैलेंद्र रावत और सुरेश जैन की सीटें दल बदलुओं को तोहफे में दे दी। यमकेश्वर से लगातार जीतने वाले विजय बड़थ्वाल की सीट खंड़ूड़ी की बेटी ऋतु को मिल गयी| बीस से ज्यादा सीटों पर इस तरह की गड़बड़ बताई जा रही है|

इसी तरह बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में भी बसपा और कांग्रेस के दागियों को तोड़ उनको मंत्री अपनी सरकार बचाई थी| उस समय के आंतरिक विद्रोह ने बीजेपी को 2002, 2007 और 2012 के तीन विधानसभा चुनावों हरवाया था| 1991 में पूर्ण बहुमत लाने वाली पार्टी 48 पर सिमट कर रह गई।

यह देखना होगा की उत्तराखंड में सत्ता की यह प्यास बीजेपी को बर्बादी के किस रास्ते पर ले जाकर छोड़ेगी|

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