राहुल गाँधी के भूकम्प से थर्रारी कांग्रेस
कांग्रेस के बड़े नेता ये तो मानते है कि नोटबंदी के बहाने राहुल गांधी ने अपनी निजी राजनीति तो चमका लिया है| परन्तु वे यह भी मानते है कि राहुल गाँधी ने प्रधानमंत्री पर गैर-ज़िम्मदाराना और बासी आरोप लगाकर मोदी जी को नोट बंदी के दलदल से निकल जाने का मौक़ा दे दिया है| और साथ ही उनको यह भी मलाल है कि इस तरह की केजरीवाल सरीखी अरोपबाजी का प्लान बनाने से पहले उनसे सलाह नही ली गई| इस कारण कुछ वरिष्ठ नेता राहुल के ताजा राजनीतिक रवैये से खुश नहीं हैं। परन्तु उनकी मजबूरी यह है कि वे नाराजगी जाहिर नहीं नहीं सकते। अगर कर दें, तो उनके अपने राजनैतिक जीवन में भूचाल आ जाएगा क्योंकि कांग्रेस में गाँधी परिवार के आचरण के विरुद्ध बोलने का अर्थ राजनैतिक आत्महत्या होती है|
यद्दपि राहुल गाँधी अभी भी उपाध्यक्ष ही है परन्तु उन्होंने अपने फैसले खुद लेने शुरू कर दिया है| अब वे सोनिया गाँधी के केवल राय भर ही करते है परन्तु उनको लागू कैसे करें इसमें किसी वरिष्ट कांग्रेसी से कोई राय-बात नहीं होती| इसका फैसला केवल राहुल और उनकी चौकड़ी ही करती है| राहुल गाँधी के खिलाफ बोलने वालो को ना केवल कांग्रेस से बाहर का रास्ता देखना पडा है बल्कि उनका राजनैतिक जीवन भी दांव पर लग गया| रीता बहुगुणा इसकी ताज़ी मिसाल है|
वरिष्ट कांग्रेस नेताओं को पता है की निकट भविषय में कांग्रेसी कोई बड़ी जीत तो हासिल नहीं कर पाएगी परन्तु कांग्रेस के अन्दर रहने मात्र से “मक्खन” की कोई कमी नहीं होगी| इसलिए जानकार भी वे राहुल-भूकंप के विरुद्ध सार्वजनिक रूप में बोलने को तैयार नहीं है|
यह तो पक्का है की राहुल गाँधी के खुलास देश के लिए फुस्सी-बम साबित हुआ परन्तु उससे कांग्रेस ज़रूर थर्रा गई है|




