मोदी के गंगा उलटी या सीधी?

मोदी के गंगा उलटी के साथी नृपेन्द्र मिश्र
मोदी के गंगा उलटी के साथी नृपेन्द्र मिश्र

मोदी के गंगा उलटी के साथी नृपेन्द्र मिश्र

सरकारी नियम कायदे लम्बे अनुभव के बाद बनते है ताकि काम भी सुचार रूप से चले और सभी की खाल भी बची रहे| परन्तु कई बार…नही बहुत बार… त्वरित एवं सही कार्यवाई के लिए इनको अलिखत रूप में तोड़ा जाता है| जैसे की कोई भी प्रस्ताव निचले स्तर के कार्यालय से ही आना चाहिए जिस पर बड़ा अधिकारी अपनी अनुमति प्रदान करे| परन्तु कई बार उच्य अधिकारी नीचे के अधिकारी को बुला कोई ख़ास प्रस्ताव अपने सामने बनवाते है और फिर उसपर अनुमति प्रदान कर देते है|

पूरी नौकरी में मैं हमेशा अपने अफसरों से बहस करता रहा कि प्रपोज़ल निचके के अधिकारी ही क्यों करे? क्या किसी को इतनी अक्ल नहीं की यदि निचले अधिकारी इतने अक्लमंद है जो शानदार प्रपोज़ल दे सकते है तो उनको ही उच्चय अधिकारी क्यों न बना दिया जाए| मेरे हिसाब से जिसको उस कार्य की प्रस्तावना का विचार आया वही उसका नोट तैय्यार कर सबकी राय ले| परन्तु सरकारी दफ्तर तो सरकारी ही होता है| मैं बकबक करता हुआ रिटायर भी हो गया मगर अभी भी वैसे ही प्रपोज़ल आते है और बड़े अधिकारी उसे मजूर करते है ताकि अगर उसमे कोई गलती हो तो नीचे का अफसर-कर्ल्क मरे| तभी तो बड़े अफसर कोर्ट से छूट जाते है|

मोदी जी ने शायद वैसे ही सोचा जैसे मैं सोचता रहा था| शायद उनकी सोच है की जो उनकी योजना है उसका प्रपोजल PMO तैय्यार करे| ऐसे सभी प्रपोजल को नृपेन्द्र मिश्र अच्छी तरह से अध्यन कर PM के सचिव भास्कर खुल्बे के द्वारा मोदी जी के सबसे विश्वस्त मंत्री अरुण जेटली के पास भेजते है ताकि उनकी राय और अनुमोदन ले सके| जब जेतली प्रपोज़ल को पूरी तरह से संतुष्ट हो जाते है तब यह फ़ाइल PMO वापस आ जाती है| तदुपरांत इसे सम्बन्धित मंत्रालय में क्रियान्वन के लिए भेज दिया जाता है| तभी कोई ताज्जुब नहीं कि मोदी की अधिकाँश योजनाये तुरंत कार्यरूप में आ जाती है|

इस सारी प्रक्रिया में फाइनेंस मिनिस्ट्री परेशान है की हर मामले में उसकी रगड़ाई क्यों होती है| अरे भईया होगी ही| हर काम में पैसा लगता है और पैसा तो वित्त मंत्रालय ही तो देता है|

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