नोट बंदी और राजस्थान की राजनीति

नोटबंदी ने राजस्थान में विपक्षी कांग्रेस के साथ ही सत्तारूढ़ भाजपा के नेताओं की भी निजी व्यस्तता बढ़ा दी। ऐसा झटका लगा की सभी गुटबाजी भूल गए हैं| कहने को कांग्रेस में गुटबाजी अधिक है परतु बीजेपी कांग्रेस से ज्यादा पीछे नहीं है| चाक चौबंद के मामले में दोनों कि बराबर कि प्रतिस्पर्धा है।

कांग्रेस ने नोटबंदी से लोगों को हो रही तकलीफ के मुद्दे पर सूबे में जगह-जगह विरोध की शृंखला शुरू की तो सभी गुटों के नेता उसमें सक्रिय नजर आए। वैसे भी सूबे के कांग्रेसी नेताओं में भोज की राजनीति का खूब बोलबाला है| बजह साफ़ है कि रात्री भोज में गुटबाजी कुछ कम सी हो जाती है| और मकसद गुटबाजी से उबरना ही है।

अशोक गहलोत और सचिन पायलट की तरफ से ऐसे भोज हो भी चुके हैं। दोनों मौकों पर ही तमाम कद्दावर नेता नजर आए। सूबे के पार्टी प्रभारी गुरुदास कामत की देखरेख सारी कवायद जारी है| परन्तु प्रधानमंत्री के नोट बंदी ने आपस में एक दुसरे की तंग खीचते नेताओं को पास ला दिया| आखिर क्योंकि| प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नोटबंदी ने इनकी गुटबाजी को कम करने में बड़ी सहायता पहुचाई| क्योंकि पीठ कि मार को राजस्थान के वीर तो दिखा नहीं सकते परन्तु पेट पर पड़ी मार सब मिले कर झेलने को तैयार होगये है| इस बदले माहोल में पार्टी आलाकमान को राजस्थान में अनंत संभावनाएं दिखती हैं। रिवाज भी ऐसा ही है सूबे का कि एक बार भाजपा जीतती है तो अगली बार कांग्रेस।

आलाकमान का आकलन है कि वसुंधरा राजे की सरकार जनता के बीच अपनी बेहतर छवि बनाने में नाकाम रही है। लिहाजा लोग उसे हटाएंगे ही। कांग्रेस को कुछ करना ही नहीं है। महज गुटबाजी से उबर कर अपनी एकता के दम पर विकल्प के रूप में सामने आना है। रही सत्तारूढ़ दल की बात तो उसमें भी गुटबाजी बेहिसाब है। हां, सत्ता के लोभ के चलते खुल कर बगावत से घबरा रहे हैं असंतुष्ट नेता। संघी और गैर-संघी नेताओं का वर्गीकरण तो हर किसी को पहली नजर में ही साफ दिख जाता है। संघियों की पीड़ा यही है कि सरकार में भी उनकी खास हैसियत नहीं और संगठन भी उनके नियंत्रण से बाहर ठहरा।

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