धोनी बेमिसाल – काश दुसरे भी कुछ सीखे

महेंद्र सिंह धोनी

महेंद्र सिंह धोनी

हमेशा तो नहीं परन्तु कभी-कभा भारतीय क्षितिज पर कुछ ऐसा हो जाता है जो बेमिसाल होता है| ऐसा ही कुछ पिछले दिनों हुआ| अनुराग ठाकुर या अजय शिर्के को सर्वोच्य न्यायलय ने लातमार कर बाहर कर दिया| यह मत सोचिये की अनुराग ठाकू और अजय शिर्के किन्ही व्यक्ति का नाम है| ये प्रतिक है, प्रतिनिधि चेहरे है किसी शरद पवार, अरुण जेटली, राजीव शुक्ला आदि उन नेताओं के जिन्होंने क्रिकेट बोर्ड के जरिए अपने को पॉवर, ग्लैमर और कनेक्टीविटी से जोड़ खेल को काला बनाया हुआ था। और लोढ़ा समिति की सिफारिशों और सुप्रीम कोर्ट के साफ आदेश के बावजूद जिन्होंने बीसीसीआई और प्रदेश क्रिकेट संगठनों में सुधार नहीं किए, बल्की सुप्रीम कोर्ट को ठेंगा बताने की हिम्मत किया क्योंकि इनके ऊपर सत्ता मद में दुबे लालची नेताओ का वरद हस्त था|

और दूसरी तरफ श्री महेंद्र सिंह धोनी ने स्वेच्छा से, वक्त से पहले कप्तानी छोड़ दिया; वह भी बिना किसी तरह के दबाव से| धोनी ने कबीर की कथन “जों की तों धर दीनी चदरिया” को पूर्णरूपेण चरित्रार्थ कर दिया| धोनी खेल की दुनिया से इतनी शांति से विदा हो गए जैसे कभी जुड़े ही नही थे| इस देश में 70 साल से भी अधिक उम्र के लोगों का सालों से कुंडली मार विभिन्न खेल-बोर्ड तथा क्रिकेट बोर्ड पर काबिज़ रहना मामूली बात है तो वही महेंद्र सिंह धोनी का स्वेच्छा से, वक्त से पहले कप्तानी छोड़ना भी अनहोनी ही माना जाना चाहिए|

जब तक सांस तब तक कुर्सी से चिपके रहना अखिल भारतीय धर्म है| शरीर साथ छोड़ने लगता है, सांस काबू में नहीं रहती, परन्तु कुर्सी का मोह नहीं छूटता| मरने को करीब है परतु ये सत्ता के लालची अपना अधिकार किसी और को नहीं देते, चाहे वह सोनिया गाँधी हो, या मुलायम सिंह या मायावती या कोई और| मैं और बस मैं-यही है सारा खेल| जिस देश में वानप्रस्थ की परंपरा रही हो, उस देश में अडवाणी जैसे बुज़ुर्ग नेता मार्गदर्शक की भूमिका को अपने राजनैतिक हत्या मानते है| राजनीति से लेकर व्यवसाय तक, कोई भी वानप्रस्थ जाने को तैयार नहीं होता| चाहे वह रतन टाटा या नारायण मूर्ति ही क्यों ना हो|

उस अवस्था में महेंद्रसिंह धोनी की कप्तान जिम्मेवारी छोड़ने की घोषणा बेमिसाल है। वे चाहते तो 2019 तक कप्तान बने रह सकते थे। क्रिकेट टीम के भारत कप्तानों को भी समय पर रिटायर करना आसान नहीं रहा है। एक से एक महान खिलाडियों को रिटायर करने में बोर्ड के छक्के छूट गए| परन्तु धोनी के एक मिसाल पेश किया की इससे पहले लोग कहे की क्यों जमे हो, खुद ही यो हट जायो कि लोग पूछे की क्यों हटे?

फ़िलहाल आशा तो नहीं है की कोई भी धोनी के इस शानदार कदम पर चलेगा, परन्तु प्रार्थना है की लोग धोनी के कदम पर चलें|

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