सहकारी बैंक या काले धन के उद्गम सोत्र
जैसा की सभी को पता है कि हमारे देश में सहकारी बैंक शक्तिशाली नेताओं के आर्थिक हाथ है जिसके ज़रिये वे ग्रामीण क्षेत्र को ना केवल कण्ट्रोल करते है बल्कि अपनी काली कमाई सफ़ेद भी करते है|
कुछ दिनों महाराष्ट्र के सबसे शक्तिशाली नेता की सुपुत्री में अपनी कमाई 117 करोड़ बता कर सबको चौका दिया क्योंकि उनके पास 9 एकड़ के आसपास खेती कि ज़मीन है| होसकता है कि उनकी कमाई जायज़ हो परन्तु सहकारी बैंक के द्वारा काले धन को बिना टैक्स दिए सफ़ेद करने की प्रबल सम्भावना बनी रहती है| वजह एकदम साफ है की हमारे देश में कृषि आय पर आयकर नहीं लगता| जिसका फायद किसान कम ये नेता अधिक उठाते है|
इसलिए नोट बंदी के कुछ दिन के भीतर ही रिज़र्व बैंक ने इन सहकारी बैंक की किसी भी शाखा पर पुराने नोटों को जमा करके उसके बदले में नए नोट देने पर रोक लगा दिया था| इस आदेश पर सारे देश में सहकारी बैंक के कर्मचारियों ने हड़ताल भी किया जो और कुछ नही बल्कि उजले कपडे में काले कारनामो को अंजाम देते हुए नेताओं कि ही धमकी थी| सुनते है कि हिमाचल के एक सहकारी बैंक ने नोट बंदी के 1-2 दिन मात्र में पुराना 550 करोड़ रुपया बदल डाला|
आज जो रुपया जगह जगह पकड़ा जा रहा है उसमे से अधिकाशं सहकारी बैंक की भ्रष्टाचार की नदी से निकल कर आये है| इनकी मात्र तब से और बढ़ गई जब से राजनैतिक दबाव में आकर सरकार ने नाबार्ड से ज़रिये 2100 करोड़ रुपया इन सहकारी बैंक को दिया था|




