मोदी की अफसरों पर ढीली लगाम

नरेंद्र मोदी

नरेंद्र मोदी

नरेंद्र मोदी की पुरानी आदत है की वे मंत्रियो की अपेक्षा अफसरों पर अधिक भरोसा करते है| ऐसा नही की वे मंत्रियों की स्वतंत्रता में बाधक होते है| मंत्रियो को काम करने की छुट होती है परन्तु एक सीमा तक| मंत्रियो के सचिव सीधे मोदी जी के सचिवालय को भी रिपोर्ट करता रहा है| गुजरात में यह चला और खूब चला, बहुत सफलता से चला| क्योंकि प्रदेश में अफसरों का एक ही माई-बाप होता है और वह होता है मुख्यमंत्री| इसकी सफलता का दूसरा कारण प्रदेश होना भी था| प्रदेश का मतलब तकरीबन पूरे प्रदेश का स्वाभाव एक सा होना, एक सी भाषा, एक सा व्यापारिक भाव| फिर गुजरात यों भी व्यापार उन्मुखी प्रदेश है| वहां मंत्री से लेकर संत्री तक की पहली वरीयता व्यापार है| उनका वसूल है की दूकान से घर बनता है, घर से दूकान नहीं बनता|

परन्तु दिल्ली देश की राजधानी है| यहाँ बैठा अफसर से लेकर चपरासी तक एक अन्य हवा में उड़ने वाला प्राणी होता है| यहाँ के अफसर इस बात मानते है की वे है स्थायी शासक| जनता के प्रतिनिधि तो अधिक से अधिक 5 वर्ष के लिए आते है और इससे पहले वे नियम-नियमावली समझे, उनके विदा होने का समय हो जाता है| और अगर कोई मत्री या प्रधान-मंत्री ने ज्यादा चूँ-चपड किया, ज्यादा योजना बनाई जिसमे अफसरों को कोई इंटरेस्ट नही है तो वे उस योजना को लागू करने के लिए ऐसा प्लान बनाते है जो देखने सुनने में तो बहुत अच्छी लगेगा परन्तु उसका क्रियावान इतना कठिन होगा कि जनता कष्ट से मर जाती है परन्तु मत्री क्रियावान में कोई कमी नहीं खोज पाता|

यही हो रहा है प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षी योजनाओं के साथ| स्वच्छ भारत के साथ यही हुआ| जितना पैसा इस योजना के अंतर्गत शौचालय बनवाने में लगा उसके एक बड़ा हिस्से में बराबर उसका विज्ञापन करने में खर्च हो रहा है| DAVP अपने उसी पुराने ढर्रे से चल रहा है| वहां अफसरों का इतना बोलबाला है की सूचना प्रसारण मंत्री भी उनका कुछ नहीं कर पाते|

यही हो रहा है नोट-बंदी के साथ| यदि नोट-बंदी के बाद अफसरों ने सच्चे मन से जनता की तकलीफ को समझते हुए काला-धन-धारियों को फंदे में कसा होता और जनता को त्वरित नोट पहुचने की व्यवस्था किया होता तो मोदी सरकार को इतनी बदनामी न सहन करना पड़ता| परन्तु यह तो सरकारी अफसर कर ही नही सकते| जनता के तकलीफ समझकर उसका हल खोजने वाले अफसर बहुत ही कम है| उनका एक ही ध्येय होता है की किस तरह सम्बन्धित मंत्री को बताया जाए की उनका काम बहुत अच्छा है और जो अच्छा नहीं है वह उनके कारण नही बल्कि किसी और के कारण है|

अगर यह मान भी लिया जाय की मोदी जी ने नोट-बंदी का फैसला अचानक स्वयं ही ले लिया होगा| तो भी यह मानना असंभव है की मोदी जी ने इसको लागू करने से पहले परोक्ष रूप में इसके पीछे के प्रोसेस को समझने का प्रयास न किया हो| जैसे नए नोट प्रतिदिन कितने छाप सकते है? क्या नए नोट बिना तकनीकि बदलाव ATM से लिए जा सकते है? इत्यादि…

ज़ाहिर है सम्बंधित अफसरों ने मोदी जी को गुमराह किया है| और नोट-बंदी के बाद अति-लचर तरीके से नए नोट बांटे गए| ग्रामीण इलाके का बिना पूरा संज्ञान लिए नोट बांटे गए| जिसके कारण ग्रामीण निवासियों को अकथनीय कष्ट का सामना करना पड़ा| अति छोटे फुटकर व्यापारियों के व्यापार बंद सा हो गया| दैनिक मजदूरो को काम मिलना कठिनतम हो गया| बैंक के आगे लम्बी लाइन ने सीनियर नागरिको को छोडिये, जवानो के हौसले भी पस्त कर दिया| तकलीफ की लिस्ट लम्बी है और शायद अभी 1-2 माह और लगेगा स्थित सामान्य होने में|

यह एक तकलीफदय परन्तु एक नया अनुभव रहा होगा मोदी जी के लिए| क्योंकि अफसरों की तमाम नाकामियों के बावजूद प्रधानमंत्री और अन्य सम्बंधित मत्री अपने ज़िम्मेदारी को अफसरों पर डाल कर मुक्त नहीं हो सकते| मोदी जी को यह समझना ही पड़ेगा की अफसर लोग किसी के सगे नहीं हो सकते| उनको 35 वर्ष नौकरी करनी होती है जिसमे उनको जिला प्रशासन करने से लेकर मंत्रियो के जूते तक उठाने पड़ सकते है| उनकी नौकरी जनता की सेवा करने से नहीं चलती बल्की मंत्री को मक्खन लगाने से चलती है| फिर वो क्यों करे जनता की सेवा| यदि मोदी जी भारत की सेवा करना चाहते है तो इस अफसरशाही पर कसकर लगाम लगानी ही पड़ेगी|

आशा है मोदी जी इस अनुभव से सीखकर असफर पर निर्भरता कम कर उनपर लगाम कसेंगे और अपने बचे कार्यकाल को देश की भलाई में लगायेंगे|

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