अमित शाह का दुसाहस
अमित शाह ने ओम माथुर, संगठन मंत्री बंसल, प्रदेश अध्यक्ष केशवप्रसाद मोर्य व सर्वेक्षण टीम की फीडबैक पर चुनाव जीत सकने की रणनीति बनाने में जो दुस्साह दिखाते हुए जो दबंगई की है वह अभूतपूर्व है| अमित शाह का दुस्साहस इस सोच में है कि पुराने नेता, कार्यकर्ताओं की नाराजगी दो –चार दिन रहेगी। फिर सब पार्टी को जीताने में जुटे जायेंगे। केशवप्रसाद मोर्य के चेहरे से अगले मुख्यमंत्री का अति पिछड़ों में चुपचाप मैसेज जा रहा है। भाजपा ईबीसी, गैर-यादव पिछड़ों, राजपूत-जाट-बनियो और कुछ हद तक ब्राहण व गैर-जाटव दलित का वैसा ही समीकरण सोच रही है जैसा मई 2014 में सोचा था।
ऐसा नहीं की यह दुसाहस केवल अमित शाह ने दिखाया हो| यह साहस अखिलेश यादव, मायावती, राहुल गांधी और अजितसिंह ने भी दिखाया है| इस बार UP में बिहार माडल फिट नही हो पाया है| अखिलेश यादव और मायावती दोनों ही मुस्लिम वोट के लिए मारामारी कर रहे है| तो भाजपा का अति पिछड़े वोट- राजपूत-बनिया वोट को अपनाने में पूर्ण आत्मविश्वास दिखा रही है| फिर अजीत सिंह अकेले के दमपर जाट वोटो का ज़हूरा दिखा रहे है|
सभी के सभी आत्मविश्वास दिखाते हुए ऐसे पेंतरे चल रहे है कि उत्तर प्रदेश का चुनाव इतना बिखर गया है की उसका पूर्वानुमान लगाना किसी भी विशेषज्ञ के लिए मुश्किल सिद्ध हो रहा है|
देखिये आगे आगे होता है क्या?




